UKSSSC TEST 30

UKSSSC / UKPSC टेस्ट 30 – Extreme Hard 30 प्रश्न | GyanLeela
UKSSSC / UKPSC 2026
टेस्ट 30 • Extreme Hard

UKSSSC / UKPSC टेस्ट 30

Extreme Hard • 30 प्रश्न • 23 अक्टूबर 2026

📋 टेस्ट की जानकारी

  • 📌 कुल प्रश्न: 30 प्रश्न (Extreme Hard)
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“अकिंचनता” का विलोम शब्द: अर्थ, व्युत्पत्ति और प्रतियोगी परीक्षाओं में महत्व

“अकिंचनता” का सर्वथा उपयुक्त और सटीक विलोम शब्द “संपन्नता” है।

हिंदी व्याकरण में यह एक ऐसा विलोम युग्म है जो प्रतियोगी परीक्षाओं में अभ्यर्थियों को भ्रमित करता है, क्योंकि “प्रचुरता”, “पराकाष्ठा” और “वैभवशाली” जैसे निकट शब्द विकल्पों के रूप में दिए जाते हैं। इनके सूक्ष्म अर्थ-भेद और शब्द-भेद (संज्ञा-विशेषण) को समझना आवश्यक है।

“अकिंचनता” का अर्थ और व्युत्पत्ति

“अकिंचनता” संस्कृत मूल का तत्सम शब्द है। यह “अ” (निषेधात्मक उपसर्ग) + “किंचन” (कुछ भी) + “ता” (भाववाचक प्रत्यय) के योग से बना है। “किंचन” का अर्थ है — कुछ भी, थोड़ा सा।

अतः “अकिंचन” का अर्थ हुआ — जिसके पास कुछ भी न हो, निर्धन, दरिद्र। इसी का भाववाचक रूप “अकिंचनता” है, जिसका अर्थ है — अत्यधिक दरिद्रता, निर्धनता, जिसके पास कुछ भी न होने की अवस्था।

अकिंचनता का विलोम: संपन्नता क्यों सर्वाधिक उपयुक्त है?

चूंकि “अकिंचनता” एक भाववाचक संज्ञा है जो दरिद्रता की अवस्था को दर्शाती है, इसका विलोम भी भाववाचक संज्ञा होना चाहिए जो समृद्धि की अवस्था को व्यक्त करे। “संपन्नता” का अर्थ है — संपन्न होने का भाव, समृद्धि, वैभव। जहाँ अकिंचनता “कुछ न होने” की अवस्था है, वहाँ संपन्नता “सब कुछ होने” की अवस्था है। यह एक-दूसरे के पूर्ण विपरीत हैं, अतः “संपन्नता” सर्वथा उपयुक्त विलोम है।

यहाँ निकटवर्ती शब्दों के भेद को समझना आवश्यक है:

प्रचुरता — इसका अर्थ है — अधिकता, बहुतायत। इसका विलोम “अल्पता” है, “अकिंचनता” नहीं। यह मात्रा का भाव व्यक्त करता है, जबकि अकिंचनता अभाव की अवस्था है।

पराकाष्ठा — इसका अर्थ है — चरम सीमा, अंतिम हद। इसका अकिंचनता से कोई संबंध नहीं है।

वैभवशाली — यह एक विशेषण है, जिसका अर्थ है — वैभव से युक्त। चूंकि “अकिंचनता” संज्ञा है, इसका विलोम भी संज्ञा होना चाहिए। “वैभवशाली” विशेषण होने के कारण विलोम युग्म में असंगत है। इसका संज्ञा रूप “वैभव” या “वैभवशालिता” होगा।

प्रतियोगी परीक्षाओं में क्यों पूछा जाता है?

UKPSC, UKSSSC, और अन्य राज्य लोक सेवा आयोगों की हिंदी व्याकरण परीक्षाओं में “अकिंचनता-संपन्नता” जैसी जोड़ी इसलिए पूछी जाती है क्योंकि:

  • ये तत्सम शब्द हैं, जिनका अर्थ बिना उपसर्ग-व्युत्पत्ति जाने स्पष्ट नहीं होता।
  • यहाँ शब्द-भेद (संज्ञा-विशेषण) की संगति परखी जाती है — विलोम युग्म में दोनों शब्दों का एक ही व्याकरणिक वर्ग होना चाहिए।
  • निकटवर्ती शब्द (प्रचुरता, पराकाष्ठा, वैभवशाली) अभ्यर्थियों को भ्रमित करते हैं और सूक्ष्म भेद परखा जाता है।

अकिंचनता और संपन्नता का प्रयोग: उदाहरण

अकिंचनता के प्रयोग:

  • “अकिंचनता में भी उसने अपना आत्मसम्मान नहीं छोड़ा।”
  • “भक्त ने अकिंचनता को ही अपना सबसे बड़ा गौरव माना।”

संपन्नता के प्रयोग:

  • “देश की आर्थिक संपन्नता उसकी उत्पादकता पर निर्भर करती है।”
  • “राज्य की सांस्कृतिक संपन्नता उसकी विविधता में निहित है।”

निष्कर्ष

अकिंचनता का सर्वथा उपयुक्त और सटीक विलोम “संपन्नता” है। “प्रचुरता” का विलोम “अल्पता” है, “पराकाष्ठा” का अकिंचनता से कोई संबंध नहीं, और “वैभवशाली” विशेषण होने के कारण संज्ञा “अकिंचनता” का समकक्ष विलोम नहीं है। प्रतियोगी परीक्षा की दृष्टि से यह जोड़ी अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह तत्सम शब्दों की समझ, शब्द-भेद की संगति और निकट शब्दों के सूक्ष्म अर्थ-भेद को परखती है। “अकिंचनता = कुछ न होना” और “संपन्नता = सब कुछ होना” — यही सूत्र इस प्रश्न का सटीक उत्तर सुनिश्चित करता है।

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