UKSSSC / UKPSC टेस्ट 19
📋 टेस्ट की जानकारी
- 📌 कुल प्रश्न: 30 प्रश्न (Extreme Hard)
- ⏱️ कुल समय: 25 मिनट
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84 दिनों की शहादत: श्रीदेव सुमन और टिहरी राज्य प्रजामंडल का वह ऐतिहासिक आमरण अनशन
12 अक्टूबर 2026
भूमिका
भारत के स्वतंत्रता संग्राम में ऐसे अनेक सेनानी हुए हैं जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर इतिहास के पन्नों में अमर स्थान प्राप्त किया। उत्तराखंड की धरती ने भी ऐसे वीर सपूतों को जन्म दिया है, जिनका बलिदान आज भी पीढ़ियों को प्रेरणा देता है। ऐसे ही एक महान सेनानी थे श्रीदेव सुमन, जिन्होंने टिहरी रियासत के अत्याचारों के विरुद्ध 84 दिनों तक अखंड आमरण अनशन (Fast unto death) किया और अंततः 25 जुलाई 1944 को जेल में ही शहादत प्राप्त की।
यह लेख UKPSC और UKSSSC की कठिनतम परीक्षाओं की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि उत्तराखंड के इतिहास में श्रीदेव सुमन का योगदान और टिहरी राज्य प्रजामंडल का आंदोलन एक ऐसा विषय है जिससे हर वर्ष प्रश्न पूछे जाते हैं।
श्रीदेव सुमन: जीवन परिचय
श्रीदेव सुमन का जन्म 25 मई 1916 को टिहरी गढ़वाल के जौल गांव (वर्तमान में टिहरी जिले के कीर्तिनगर ब्लॉक में) में हुआ था। उनके पिता का नाम हरिराम बडोनी और माता का नाम तारा देवी था।
प्रारंभिक शिक्षा के बाद उन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि प्राप्त की और वहीं से एलएलबी (विधि) की डिग्री भी हासिल की।
श्रीदेव सुमन बचपन से ही सामाजिक अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने वाले स्वभाव के थे। काशी में अध्ययन के दौरान वे राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े और महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित हुए।
टिहरी रियासत की स्थिति
उस समय टिहरी एक रियासत थी, जिस पर नरेंद्र शाह का शासन था। रियासत में आम जनता पर अनेक अत्याचार होते थे:
- बेगार प्रथा: बिना मजदूरी के जबरन श्रम कराना
- भारी लगान: किसानों से अत्यधिक कर वसूलना
- वन कानूनों का दुरुपयोग: जंगलों से लकड़ी और घास लेने पर प्रतिबंध
- न्याय का अभाव: आम जनता को न्याय नहीं मिलता था
- शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव
इन समस्याओं के समाधान के लिए 1938 में टिहरी राज्य प्रजामंडल की स्थापना की गई, जिसके प्रमुख नेता श्रीदेव सुमन थे।
प्रजामंडल की मुख्य मांगें
टिहरी राज्य प्रजामंडल ने महाराजा के समक्ष निम्नलिखित मांगें रखीं:
- बेगार प्रथा का पूर्ण उन्मूलन
- भूमि और वन कानूनों में सुधार
- न्यायपूर्ण कर प्रणाली
- शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार
- जनता को राजनीतिक अधिकार
- प्रजामंडल पर से प्रतिबंध हटाना
लेकिन महाराजा ने इन मांगों को ठुकरा दिया और प्रजामंडल के नेताओं पर अत्याचार शुरू कर दिए।
84 दिनों का ऐतिहासिक अनशन
अनशन की शुरुआत
3 मई 1944 को श्रीदेव सुमन ने टिहरी जेल में आमरण अनशन शुरू किया। उनकी मांगें स्पष्ट थीं:
- बेगार प्रथा की समाप्ति
- प्रजामंडल पर से प्रतिबंध हटाना
- राजनीतिक बंदियों की रिहाई
- जनता को न्याय
84 दिनों का संघर्ष
श्रीदेव सुमन ने 3 मई 1944 से 25 जुलाई 1944 तक लगातार 84 दिनों तक कुछ भी नहीं खाया। इन 84 दिनों में:
- उनका स्वास्थ्य दिन-प्रतिदिन गिरता गया
- सरकार ने उन्हें तोड़ने के अनेक प्रयास किए
- उनके परिवार और साथियों ने उन्हें अनशन तोड़ने के लिए मनाया
- लेकिन वे अपने संकल्प पर अडिग रहे
शहादत
25 जुलाई 1944 को श्रीदेव सुमन ने टिहरी जेल में अंतिम सांस ली। उनकी शहादत ने पूरे उत्तराखंड को हिला दिया। उनकी मृत्यु के बाद:
- टिहरी रियासत में व्यापक आंदोलन हुआ
- अंततः 1949 में टिहरी रियासत का भारत में विलय हुआ
- बेगार प्रथा का अंत हुआ
- जनता को अधिकार मिले
श्रीदेव सुमन का योगदान और विरासत
सामाजिक सुधार
श्रीदेव सुमन ने न केवल राजनीतिक बल्कि सामाजिक सुधारों पर भी बल दिया:
- छुआछूत का विरोध
- नारी शिक्षा का समर्थन
- किसानों के अधिकारों की रक्षा
- शराबबंदी का समर्थन
शिक्षा का प्रसार
उन्होंने टिहरी क्षेत्र में अनेक स्कूलों की स्थापना में योगदान दिया और लोगों को शिक्षित करने का कार्य किया।
प्रेरणा स्रोत
श्रीदेव सुमन की शहादत ने उत्तराखंड के स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा दी। उनके बलिदान से प्रेरित होकर अनेक युवाओं ने आंदोलन में भाग लिया।
परीक्षा दृष्टि से महत्वपूर्ण तथ्य
| विवरण | तथ्य |
|---|---|
| जन्म | 25 मई 1916, जौल गांव, टिहरी |
| पिता | हरिराम बडोनी |
| माता | तारा देवी |
| शिक्षा | काशी हिंदू विश्वविद्यालय (एलएलबी) |
| संगठन | टिहरी राज्य प्रजामंडल (1938) |
| अनशन की अवधि | 3 मई 1944 से 25 जुलाई 1944 |
| अनशन के दिन | 84 दिन |
| शहादत | 25 जुलाई 1944 |
| स्थान | टिहरी जेल |
| टिहरी का भारत में विलय | 1949 |
निष्कर्ष
श्रीदेव सुमन का 84 दिनों का आमरण अनशन भारतीय इतिहास में एक अद्वितीय उदाहरण है। यह न केवल टिहरी रियासत के अत्याचारों के विरुद्ध एक संघर्ष था, बल्कि आम जनता के अधिकारों के लिए एक महान बलिदान भी था। उनकी शहादत ने सिद्ध किया कि सत्य और न्याय के लिए किया गया संघर्ष कभी व्यर्थ नहीं जाता।
आज जब हम उत्तराखंड के इतिहास की बात करते हैं, तो श्रीदेव सुमन का नाम सर्वोच्च स्थान पर आता है। उनका जीवन और बलिदान आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा।
UKPSC और UKSSSC की परीक्षाओं के लिए यह विषय अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि उत्तराखंड के इतिहास में श्रीदेव सुमन और टिहरी राज्य प्रजामंडल के आंदोलन से संबंधित प्रश्न नियमित रूप से पूछे जाते हैं।
“शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले। वतन पर मरने वालों का बाकी यही निशां होगा।”
— श्रीदेव सुमन को श्रद्धांजलि