UKSSSC कनिष्ठ सहायक टेस्ट 3
📋 टेस्ट की जानकारी
- 📌 कुल प्रश्न: 30 प्रश्न
- ⏱️ कुल समय: 20 मिनट
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🔑 उत्तर कुंजी
कुशही कर क्या था? उत्तराखंड के गोरखा शासन में लगाया गया यह कर क्यों महत्वपूर्ण था?
उत्तराखंड के इतिहास में गोरखा शासनकाल एक महत्वपूर्ण अध्याय है। इस दौरान कुमाऊं और गढ़वाल क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार की कर एवं राजस्व व्यवस्थाएं लागू की गई थीं। इन्हीं में से एक महत्वपूर्ण कर था ‘कुशही’ या ‘कुसही’ कर, जिसके बारे में UKSSSC, UKPSC, पटवारी-लेखपाल, कनिष्ठ सहायक और अन्य उत्तराखंड प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रश्न पूछे जा सकते हैं।
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि कुशही कर गोरखा शासनकाल में ब्राह्मणों पर लगाया जाने वाला भूमि कर था।
उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय की अध्ययन सामग्री के अनुसार, गोरखा शासन से पहले ब्राह्मणों से कर नहीं लिया जाता था। लेकिन 1797 ई. में बमशाह और रूद्रवीर शाह के कुमाऊं में आने के बाद ब्राह्मण काश्तकारों पर ‘कुशाही’ नामक नया भूमि कर लगाया गया।
कुशही कर किस पर लगाया जाता था?
कुशही कर मुख्य रूप से ब्राह्मण काश्तकारों पर लगाया गया भूमि कर था।
ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार 1797 में गोरखा प्रशासन के दौरान यह कर लागू किया गया। उपलब्ध ऐतिहासिक सामग्री में इसकी दर प्रति ज्यूला लगभग 5 रुपये बताई गई है। ज्यूला उस समय भूमि माप की एक इकाई थी, जिसका क्षेत्रफल लगभग 6 से 13 एकड़ के बीच बताया गया है।
परीक्षा के लिए सीधा तथ्य
कुशही कर → ब्राह्मणों पर → भूमि कर → गोरखा शासन → 1797 ई.
इसे इसी क्रम में याद करना सबसे आसान है।
उत्तराखंड में गोरखा शासन कब था?
उत्तराखंड के इतिहास को समझने के लिए गोरखा शासन की पृष्ठभूमि जानना जरूरी है।
गोरखाओं ने पहले 1790-91 के आसपास कुमाऊं पर अपना नियंत्रण स्थापित किया। इसके बाद गढ़वाल पर भी गोरखा प्रभाव बढ़ा और 1803-04 में गढ़वाल पर उनका अधिकार स्थापित हो गया।
उत्तराखंड के राजस्व बोर्ड के अनुसार 1790-91 के दौरान गोरखाओं के आक्रमण के बाद कुमाऊं और गढ़वाल का पूरा क्षेत्र गोरखाओं के अधीन आ गया। बाद में 1815 की संधि के बाद कुमाऊं और पूर्वी गढ़वाल का क्षेत्र ब्रिटिश शासन के अधीन चला गया, जबकि टिहरी क्षेत्र राजा सुदर्शन शाह के अधीन रहा।
इस प्रकार सामान्य परीक्षा क्रम इस प्रकार याद किया जा सकता है—
1790-91 → कुमाऊं पर गोरखा नियंत्रण
1803-04 → गढ़वाल पर गोरखा नियंत्रण
1815 → गोरखा शासन का अंत और ब्रिटिश नियंत्रण
गोरखा शासन में कुशही कर क्यों लगाया गया था?
कुशही कर केवल सामान्य राजस्व वसूली का हिस्सा नहीं था। ऐतिहासिक स्रोतों में यह भी बताया गया है कि उस समय राजनीतिक गतिविधियों में शामिल ब्राह्मणों पर इस कर के माध्यम से दबाव बनाया गया।
Regmi Research में उपलब्ध ऐतिहासिक सामग्री के अनुसार, 1797 में बमशाह और रूद्रवीर शाह ने ब्राह्मणों पर कुशही कर लगाया और इसका संबंध उन ब्राह्मणों पर दबाव डालने से बताया गया है जो गोरखा शासन का विरोध करते थे। उसी स्रोत में यह भी उल्लेख है कि शांतिपूर्ण जीवन जीने वाले सभी ब्राह्मणों पर समान रूप से यह कर नहीं लगाया जाता था।
इसलिए परीक्षा में यदि पूछा जाए कि कुशही कर किस वर्ग से संबंधित था, तो उत्तर होगा—
ब्राह्मण काश्तकार।
कुशही कर और गोरखा राजस्व व्यवस्था
गोरखा शासनकाल में राजस्व वसूली के लिए कई प्रकार के कर प्रचलित थे। कुमाऊं में गांव के स्तर पर कर संग्रह की व्यवस्था की गई थी और विभिन्न प्रकार के करों से राज्य के लिए राजस्व जुटाया जाता था।
ऐतिहासिक स्रोतों में गोरखा काल के विभिन्न करों में भूमि कर तथा अन्य स्थानीय करों का उल्लेख मिलता है। इनमें कुशही कर विशेष रूप से ब्राह्मणों से संबंधित था।
इसलिए कुशही कर को सामान्य भूमि कर समझना पूरी तरह सही नहीं होगा। इसकी विशेषता यह थी कि इसका संबंध विशेष रूप से ब्राह्मण काश्तकारों से था।
कुशही कर किस वर्ष लगाया गया था?
परीक्षा की दृष्टि से 1797 ई. सबसे महत्वपूर्ण वर्ष है।
उपलब्ध उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय की सामग्री में बताया गया है कि 1797 में बमशाह और रूद्रवीर शाह को कुमाऊं की सत्ता सौंपी गई और इसी दौरान ब्राह्मण काश्तकारों पर कुशही नामक नया भूमि कर लगाया गया।
याद रखने की ट्रिक
“1797 — कुशही — ब्राह्मण”
बस इन तीन शब्दों को याद रखें।
कुशही कर की दर कितनी थी?
ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार कुशही कर की दर प्रति ज्यूला 5 रुपये बताई गई है। ज्यूला भूमि माप की एक पारंपरिक इकाई थी, जिसका आकार अलग-अलग संदर्भों में लगभग 6 से 13 एकड़ के बीच बताया गया है।
हालांकि प्रतियोगी परीक्षा में सबसे अधिक महत्वपूर्ण तथ्य कर की दर से अधिक इसका उद्देश्य और करदाता वर्ग है।
इसलिए प्राथमिकता से याद करें—
कुशही = ब्राह्मणों पर लगाया गया भूमि कर।
कुशही कर से जुड़े अन्य महत्वपूर्ण कर
गोरखा शासनकाल में केवल कुशही कर ही नहीं था। विभिन्न प्रकार के करों से राजस्व एकत्र किया जाता था।
ऐतिहासिक स्रोतों में भूमि कर के अलावा परिवार, गांव, घी, बुनाई तथा अन्य गतिविधियों से संबंधित करों का भी उल्लेख मिलता है।
इससे स्पष्ट होता है कि गोरखा शासन में राजस्व व्यवस्था काफी व्यापक थी और विभिन्न वर्गों तथा आर्थिक गतिविधियों पर अलग-अलग प्रकार के कर लगाए जाते थे।
गोरखा शासन और कुशही कर: परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
| तथ्य | उत्तर |
|---|---|
| कुशही कर किस शासन में लगाया गया? | गोरखा शासन |
| कुशही कर किस क्षेत्र के इतिहास से जुड़ा है? | कुमाऊं |
| कुशही कर किस पर लगाया गया? | ब्राह्मण काश्तकारों पर |
| कुशही कर कब लगाया गया? | 1797 ई. |
| प्रमुख संबंधित अधिकारी | बमशाह और रूद्रवीर शाह |
| कर का प्रकार | भूमि कर |
| बताई गई दर | प्रति ज्यूला 5 रुपये |
| गोरखा शासन का अंत | 1815 |
UKSSSC और UKPSC में ऐसे पूछे जा सकते हैं प्रश्न
प्रश्न 1. उत्तराखंड के इतिहास में ‘कुशही’ कर किससे संबंधित था?
(A) व्यापारियों से लिया जाने वाला कर
(B) ब्राह्मणों पर लगाया जाने वाला भूमि कर
(C) सैनिकों पर लगाया जाने वाला कर
(D) पशुपालकों पर लगाया जाने वाला कर
उत्तर: (B) ब्राह्मणों पर लगाया जाने वाला भूमि कर।
प्रश्न 2. कुशही कर किस शासनकाल में लगाया गया था?
(A) चंद शासन
(B) कत्यूरी शासन
(C) गोरखा शासन
(D) ब्रिटिश शासन
उत्तर: (C) गोरखा शासन।
प्रश्न 3. कुशही कर लगाए जाने का संबंध किस वर्ष से है?
(A) 1790
(B) 1797
(C) 1803
(D) 1815
उत्तर: (B) 1797।
प्रश्न 4. कुशही कर मुख्य रूप से किस वर्ग से संबंधित था?
(A) राजपूत
(B) शिल्पकार
(C) ब्राह्मण काश्तकार
(D) व्यापारी
उत्तर: (C) ब्राह्मण काश्तकार।
प्रश्न 5. 1797 में कुमाऊं में कुशही कर लगाने वाले प्रमुख गोरखा प्रशासकों में कौन शामिल थे?
(A) बमशाह और रूद्रवीर शाह
(B) सुदर्शन शाह और प्रद्युम्न शाह
(C) गोविंद बल्लभ पंत और बदरीदत्त पांडे
(D) हरगोविंद पंत और मोहन सिंह
उत्तर: (A) बमशाह और रूद्रवीर शाह।
कुशही कर और उत्तराखंड इतिहास को एक साथ कैसे याद करें?
परीक्षा से पहले इस पूरी जानकारी को एक छोटी टाइमलाइन के रूप में याद किया जा सकता है—
1790-91 → कुमाऊं में गोरखा नियंत्रण
↓
1797 → ब्राह्मणों पर कुशही कर
↓
1803-04 → गढ़वाल पर गोरखा नियंत्रण
↓
1815 → गोरखा शासन समाप्त
यह क्रम उत्तराखंड इतिहास के कई प्रश्नों को हल करने में मदद कर सकता है। उत्तराखंड सरकार के राजस्व बोर्ड के इतिहास विवरण में भी गोरखा आक्रमण, उनके नियंत्रण और 1815 के बाद ब्रिटिश प्रशासन में हुए परिवर्तन का उल्लेख है।
एक लाइन में कुशही कर
“कुशही कर 1797 ई. में गोरखा शासन के दौरान कुमाऊं में ब्राह्मण काश्तकारों पर लगाया गया भूमि कर था।”
निष्कर्ष
उत्तराखंड के इतिहास में कुशही कर गोरखा शासनकाल की राजस्व व्यवस्था से जुड़ा महत्वपूर्ण तथ्य है। 1797 ई. में बमशाह और रूद्रवीर शाह के प्रशासन के दौरान ब्राह्मण काश्तकारों पर यह भूमि कर लगाया गया था। ऐतिहासिक स्रोतों में इसकी दर प्रति ज्यूला 5 रुपये बताई गई है।
सुपर फास्ट रिवीजन
कुशही कर → गोरखा शासन → कुमाऊं → 1797 → ब्राह्मण काश्तकार → भूमि कर
यही छह तथ्य UKSSSC कनिष्ठ सहायक, UKPSC, पटवारी-लेखपाल और अन्य उत्तराखंड प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण हैं।