📈 उत्तराखंड टेस्ट 148
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K.S. Puttaswamy Case 2017: निजता का अधिकार और संविधान का अनुच्छेद 21
भारतीय संविधान और मौलिक अधिकारों के इतिहास में K.S. Puttaswamy बनाम भारत संघ (2017) का फैसला अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह निर्णय भारत में निजता के अधिकार (Right to Privacy) की संवैधानिक स्थिति को स्पष्ट करने वाला ऐतिहासिक फैसला था। UPSC, UKPSC, UKSSSC, SSC, PCS और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में इस मामले से संबंधित प्रश्न पूछे जा सकते हैं।
K.S. Puttaswamy Case क्या है?
वर्ष 2017 में सर्वोच्च न्यायालय की नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से निर्णय दिया कि निजता का अधिकार भारतीय संविधान के तहत मौलिक अधिकार है। न्यायालय ने इसे मुख्य रूप से संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से जोड़ा।
इस फैसले का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि इससे पहले कुछ पुराने न्यायिक निर्णयों में निजता को स्वतंत्र रूप से मौलिक अधिकार मानने की स्थिति पर अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आए थे। नौ न्यायाधीशों की पीठ ने इस संवैधानिक प्रश्न पर स्पष्टता प्रदान की।
निजता के अधिकार का महत्व
निजता का अधिकार व्यक्ति की गरिमा, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, स्वायत्तता और निजी जीवन से संबंधित है। इसमें व्यक्ति की निजी जानकारी, व्यक्तिगत निर्णयों और निजी जीवन के विभिन्न पहलुओं की संवैधानिक सुरक्षा का प्रश्न शामिल होता है।
हालांकि निजता का अधिकार पूर्ण और निरपेक्ष अधिकार नहीं है। कानून द्वारा निर्धारित संवैधानिक आवश्यकताओं और उचित प्रक्रिया के अधीन इस अधिकार पर वैध प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
मामला: K.S. Puttaswamy (Retd.) v. Union of India
वर्ष: 2017
पीठ: 9 न्यायाधीशों की संविधान पीठ
मुख्य विषय: निजता का अधिकार
संबंधित मौलिक अधिकार: अनुच्छेद 21
परीक्षा प्रश्न: K.S. Puttaswamy Case (2017) में निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार घोषित करने वाली संविधान पीठ में कितने न्यायाधीश थे?
उत्तर: नौ न्यायाधीश।
यह फैसला भारतीय संवैधानिक कानून में निजता, गरिमा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की समझ के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है।