UKSSSC कनिष्ठ सहायक टेस्ट 1
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कुमाऊं परिषद की स्थापना कब हुई थी? जानिए 1916 का इतिहास, उद्देश्य और महत्वपूर्ण तथ्य
उत्तराखंड के इतिहास में कुमाऊं परिषद का विशेष महत्व है। यह संगठन ब्रिटिश शासन के दौर में कुमाऊं क्षेत्र की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक समस्याओं को सामने लाने तथा स्थानीय जनता में राजनीतिक जागरूकता विकसित करने वाला महत्वपूर्ण मंच बना। UKSSSC, UKPSC, कनिष्ठ सहायक, पटवारी, लेखपाल, पुलिस और अन्य उत्तराखंड प्रतियोगी परीक्षाओं में कुमाऊं परिषद से संबंधित प्रश्न बार-बार पूछे जाते हैं।
कुमाऊं परिषद की स्थापना कब हुई थी?
कुमाऊं परिषद की स्थापना वर्ष 1916 में हुई थी।
उत्तराखंड सरकार से संबंधित इतिहास सामग्री के अनुसार सितंबर 1916 में पं. हरगोविंद बल्लभ पंत, गोविंद बल्लभ पंत, बदरीदत्त पांडे, इंद्रलाल शाह, मोहन सिंह दड़मवाल, चंद्रलाल शाह और अन्य लोगों के प्रयासों से कुमाऊं परिषद का गठन हुआ। इसका प्रमुख उद्देश्य पहाड़ी क्षेत्र की सामाजिक और आर्थिक समस्याओं के समाधान के लिए संगठित प्रयास करना था।
कई परीक्षा-संदर्भों में इसकी स्थापना की तिथि 30 सितंबर 1916 भी दी जाती है। इसलिए परीक्षा की तैयारी करते समय सबसे महत्वपूर्ण तथ्य “कुमाऊं परिषद — 1916” याद रखना चाहिए।
कुमाऊं परिषद के प्रमुख संस्थापक
कुमाऊं परिषद के गठन में कई स्थानीय नेताओं और शिक्षित युवाओं की भूमिका रही। प्रमुख नामों में शामिल हैं—
- गोविंद बल्लभ पंत
- पं. हरगोविंद पंत
- बदरीदत्त पांडे
- इंद्रलाल शाह
- चंद्रलाल शाह
- मोहन सिंह दड़मवाल
- प्रेम बल्लभ पांडे
- लक्ष्मीदत्त शास्त्री
- भोला दत्त पांडे
- मोहन जोशी
उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय की अध्ययन सामग्री भी 1916 में इन नेताओं के प्रयासों से कुमाऊं परिषद की स्थापना का उल्लेख करती है।
कुमाऊं परिषद की स्थापना का उद्देश्य क्या था?
उस समय कुमाऊं क्षेत्र की जनता अनेक सामाजिक और आर्थिक समस्याओं का सामना कर रही थी। ब्रिटिश शासन की नीतियों, वन संबंधी प्रतिबंधों और स्थानीय समस्याओं को लेकर लोगों में असंतोष था।
कुमाऊं परिषद ने इन समस्याओं को संगठित रूप से उठाने का प्रयास किया। इसके प्रमुख उद्देश्यों को इस प्रकार समझा जा सकता है—
- कुमाऊं क्षेत्र की सामाजिक समस्याओं को सामने लाना।
- आर्थिक समस्याओं के समाधान के लिए प्रयास करना।
- स्थानीय जनता में राजनीतिक जागरूकता पैदा करना।
- ब्रिटिश शासन की स्थानीय नीतियों के विरुद्ध जनमत तैयार करना।
- वन और ग्रामीण अधिकारों से जुड़े मुद्दों को उठाना।
- क्षेत्रीय जनता को एक राजनीतिक मंच प्रदान करना।
इतिहास संबंधी स्रोतों के अनुसार परिषद ने आगे चलकर स्थानीय समस्याओं के साथ-साथ राजनीतिक गतिविधियों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
कुमाऊं परिषद का पहला अधिवेशन
कुमाऊं परिषद की स्थापना 1916 में हुई थी, जबकि इसका पहला अधिवेशन 1917 में अल्मोड़ा में हुआ। इसकी अध्यक्षता जयदत्त जोशी ने की थी। उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय की सामग्री भी 1917 के प्रथम अधिवेशन का उल्लेख करती है।
इस तथ्य को परीक्षा के लिए अलग से याद रखें—
स्थापना — 1916
पहला अधिवेशन — 1917
स्थान — अल्मोड़ा
अध्यक्ष — जयदत्त जोशी
कुमाऊं परिषद और उत्तराखंड के राजनीतिक जागरण में भूमिका
कुमाऊं परिषद केवल एक सामाजिक संगठन तक सीमित नहीं रही। समय के साथ इसने क्षेत्रीय राजनीतिक चेतना को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
परिषद ने स्थानीय समस्याओं को राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाया। वन संबंधी समस्याओं और ग्रामीणों के अधिकारों जैसे मुद्दों को भी प्रमुखता मिली। गोविंद बल्लभ पंत की राजनीतिक सक्रियता के विकास में भी कुमाऊं परिषद का महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है।
उत्तराखंड सरकार की इतिहास सामग्री के अनुसार 1926 में कुमाऊं परिषद का भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में विलय हो गया।
कुमाऊं परिषद से जुड़े महत्वपूर्ण वर्ष
| वर्ष | महत्वपूर्ण तथ्य |
|---|---|
| 1916 | कुमाऊं परिषद की स्थापना |
| 1917 | पहला अधिवेशन, अल्मोड़ा |
| 1918 | दूसरा अधिवेशन, हल्द्वानी |
| 1919 | तीसरा अधिवेशन, कोटद्वार |
| 1920 | चौथा अधिवेशन, काशीपुर |
| 1926 | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में विलय |
अलग-अलग अध्ययन स्रोतों में कुछ अधिवेशनों के अध्यक्षों और स्थानों के विवरण में अंतर मिल सकता है, इसलिए परीक्षा में सबसे अधिक महत्वपूर्ण मूल तथ्य—स्थापना 1916 और पहला अधिवेशन 1917—को प्राथमिकता दें।
UKSSSC और UKPSC के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
1. कुमाऊं परिषद की स्थापना कब हुई?
उत्तर — 1916
2. कुमाऊं परिषद का पहला अधिवेशन कब हुआ?
उत्तर — 1917
3. पहला अधिवेशन कहाँ हुआ?
उत्तर — अल्मोड़ा
4. प्रथम अधिवेशन के अध्यक्ष कौन थे?
उत्तर — जयदत्त जोशी
5. कुमाऊं परिषद के प्रमुख नेताओं में कौन शामिल थे?
उत्तर — गोविंद बल्लभ पंत, हरगोविंद पंत, बदरीदत्त पांडे आदि।
6. कुमाऊं परिषद का भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में विलय कब हुआ?
उत्तर — 1926
परीक्षा में ऐसे पूछे जा सकते हैं प्रश्न
प्रश्न 1. कुमाऊं परिषद की स्थापना किस वर्ष हुई थी?
(A) 1912
(B) 1914
(C) 1916
(D) 1920
उत्तर: (C) 1916
प्रश्न 2. कुमाऊं परिषद का प्रथम अधिवेशन कहाँ आयोजित किया गया था?
(A) नैनीताल
(B) अल्मोड़ा
(C) श्रीनगर
(D) हल्द्वानी
उत्तर: (B) अल्मोड़ा
प्रश्न 3. कुमाऊं परिषद के प्रथम अधिवेशन की अध्यक्षता किसने की थी?
(A) गोविंद बल्लभ पंत
(B) बदरीदत्त पांडे
(C) जयदत्त जोशी
(D) हरगोविंद पंत
उत्तर: (C) जयदत्त जोशी
प्रश्न 4. कुमाऊं परिषद का गठन मुख्य रूप से किस उद्देश्य से किया गया था?
(A) सैन्य प्रशिक्षण
(B) क्षेत्र की सामाजिक और आर्थिक समस्याओं को उठाना
(C) व्यापारिक गतिविधियां बढ़ाना
(D) नई रियासत स्थापित करना
उत्तर: (B) क्षेत्र की सामाजिक और आर्थिक समस्याओं को उठाना
प्रश्न 5. कुमाऊं परिषद का भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में विलय किस वर्ष हुआ?
(A) 1920
(B) 1922
(C) 1926
(D) 1930
उत्तर: (C) 1926
एक मिनट में कुमाऊं परिषद की पूरी कहानी
1916 → कुमाऊं परिषद की स्थापना
↓
1917 → पहला अधिवेशन, अल्मोड़ा
↓
स्थानीय सामाजिक और आर्थिक समस्याओं को उठाया गया
↓
राजनीतिक जागरूकता का विस्तार हुआ
↓
1926 → भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में विलय
यही क्रम UKSSSC और UKPSC की परीक्षा में सबसे उपयोगी है।
निष्कर्ष
कुमाऊं परिषद की स्थापना वर्ष 1916 में हुई थी। इस संगठन ने ब्रिटिश शासन के दौरान कुमाऊं क्षेत्र की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक समस्याओं को सामने लाने तथा जनता में राजनीतिक जागरूकता पैदा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके प्रमुख नेताओं में गोविंद बल्लभ पंत, हरगोविंद पंत और बदरीदत्त पांडे जैसे नाम शामिल थे। 1917 में इसका पहला अधिवेशन अल्मोड़ा में हुआ और 1926 में इसका भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में विलय हो गया।
याद रखने की ट्रिक
“16 में परिषद, 17 में अधिवेशन, 26 में कांग्रेस में विलय।”
अर्थात—
1916 — स्थापना
1917 — पहला अधिवेशन
1926 — कांग्रेस में विलय
यह तथ्य UKSSSC कनिष्ठ सहायक 2026, पटवारी-लेखपाल, UKPSC और उत्तराखंड की अन्य समूह-ग परीक्षाओं के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।